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प्रयागराज कुंभ मेला 2019 : अलौकिक परंपरा और उसका महत्व

प्रयागराज कुंभ मेला 2019 : अलौकिक परंपरा और उसका महत्व

भारत में कुंभ मेले को लेकर लोगों में काफी आस्था है। कुंभ को सबसे बड़े शांतिपूर्ण सम्मेलन के तौर पर जाना जाता है। हिंदू कैलेंडर के हिसाब से यह हर 12 साल में आयोजित होता है। कई अखाड़ों के साधु और लाखों श्रद्धालु इसमें भाग लेते हैं। कुंभ को धार्मिक वैभव और विविधता का प्रतीक भी माना जाता है। इसी महत्ता को देखते हुए यूनेस्को ने भारत के कुंभ मेले को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर’ के तौर पर मान्यता दी है।

कुंभ मेला को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्रदान करने की सिफारिश करते हुए विशेषज्ञ समिति ने कहा था कि यह पृथ्वी पर तीर्थयात्रियों का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण जमावड़ा है। योग और नवरोज के बाद पिछले करीब दो वर्षो में इस प्रकार की मान्यता प्राप्त करने वाला कुंभ मेला तीसरा धरोहर है। कुंभ मेले का आयोजन देश में चार स्थान हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन में होता है।

कुंभ को UNESCO ने दुनिया की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिया है और यह माना है कि यह धरती पर होने वाला सबसे बड़ा शांतिपूर्ण धार्मिक सम्मेलन है, जिसमें विभिन्न वर्गों के लोग बिना किसी भेदभाव के भाग लेते हैं। एक धार्मिक आयोजन के तौर पर कुंभ में जैसी सहिष्णुता और समायोजन नजर आता है, वह पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण है। उम्मीद करनी चाहिए कि कुंभ के प्रति दुनिया का यह विश्वास और आस्था इसी तरह बनी रहेगी।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार समुद्रमंथन से प्राप्त अमृत के कुंभ से इन चारों स्थानों पर अमृत की कुछ बूंदें गिर गई थीं। कुंभ की अवधि में इन पवित्र नदियों में डुबकी लगाने से प्राणी मात्र के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। त्रयंबकेश्वर कुंभ को मानने वाले खुद को शैव बताते हैं जबकि नासिक कुंभ को मानने वाले वैष्णव कहलाते हैं। हिंदू कैलेंडर के हिसाब से जब माघ के महीने में सूर्य और बृहस्पति एक साथ सिंह राशि में प्रवेश करते हैं तब नासिक और त्रियंबकेश्वर में कुंभ का आयोजन होता है।

ज्योतिषियों के अनुसार कुंभ का असाधारण महत्व बृहस्पति के कुंभ राशि में प्रवेश तथा सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ जुड़ा है। प्रयाग का कुम्भ मेला सभी मेलों में सर्वाधिक महत्व रखता है। मेले की तिथि की गणना करने के लिए सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति की स्थिति की आवश्यकता होती है। प्रयागराज की इस पावन नगरी के अधिष्ठाता भगवानश्री विष्णु स्वयं हैं और वे यहाँ माधव रूप में विराजमान हैं। भगवान के यहाँ बारह स्वरूप में विद्यमान हैं।

प्रयागराज को तीर्थों का राजा कहा जाता है इसलिए यहां स्थित छोटे बड़े सभी धर्म-स्थलों का अपना एक महत्व है, अपनी एक पहचान है। संगम के ईशान कोण पर स्थित होने के कारण इस धर्मनगरी का विशेष महत्व है।

ऐसी पौराणिक मान्यता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है।

महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। इसलिए संक्रांति मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस दिन तिल-गुड़ के सेवन का साथ नए जनेऊ भी धारण करना चाहिए।

तीर्थराज प्रयाग में लगने वाले सबसे बड़े धार्मिक मेले कुंभ की चर्चा हर तरफ हो रही है। आस्था, धर्म, संस्कार, संस्कृति का संगम वाला यह सबसेबड़ा धार्मिक मेला संगम किनारे लग रहा है. जहां करोड़ों की संख्या में लोगदेश-विदेश और भारत के कोने-कोने से आएंगे। संगम के आसपास और उससे सटे हुए तमाम ऐसेमंदिर हैं जिनकी अपनी आस्था और अलग पहचान है।

लेखक – पं. दयानंद शास्त्री, उज्जैन

 

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