पाकिस्तान में शक्तिपीठ!
कल्पना कीजिए… एक ऐसा हिंदू मंदिर जो भारत में नहीं, बल्कि पाकिस्तान के दुर्गम रेगिस्तान और पहाड़ों के बीच स्थित है। एक ऐसा पवित्र स्थान जहाँ पहुँचने के लिए भक्तों को कठिन यात्रा करनी पड़ती है, और सबसे आश्चर्यजनक बात—इस मंदिर की रक्षा और श्रद्धा सिर्फ हिंदू ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय भी करता है।
यह अद्भुत स्थल है हिंगलाज माता मंदिर, जिसे लोग प्रेम से “नानी का मंदिर” भी कहते हैं।
कहाँ स्थित है हिंगलाज माता मंदिर?
हिंगलाज माता मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित हिंगोल नेशनल पार्क के भीतर आता है। यह मंदिर हिंगोल नदी के किनारे एक प्राकृतिक गुफा में बना हुआ है। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़, तपता हुआ रेगिस्तान और कठिन रास्ते—इन सबके बीच यह मंदिर आस्था का अद्भुत केंद्र बना हुआ है।
शक्तिपीठ की पौराणिक कथा
हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार, जब राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती ने आत्मदाह कर लिया, तो भगवान शिव उनके शरीर को लेकर तांडव करने लगे। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए।
जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुए।
मान्यता है कि हिंगलाज में माता सती का मस्तक (सिर) गिरा था, इसलिए यह स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक अत्यंत पवित्र स्थल माना जाता है।
“नानी का मंदिर” क्यों कहा जाता है?
इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहाँ केवल हिंदू ही नहीं, बल्कि स्थानीय मुस्लिम समुदाय भी श्रद्धा से आता है।
बलूचिस्तान के लोग माता को “नानी” कहकर पुकारते हैं, इसलिए यह मंदिर “नानी का मंदिर” के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
कई मुस्लिम परिवार यहाँ धूप, अगरबत्ती और चादर चढ़ाते हैं और अपनी मनोकामनाएँ मांगते हैं। यह स्थान धर्म से ऊपर उठकर इंसानियत और आस्था का प्रतीक बन गया है।
हिंगलाज यात्रा: आस्था की परीक्षा
हर साल वसंत ऋतु में यहाँ हिंगलाज यात्रा का आयोजन होता है। इस दौरान पाकिस्तान और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से हजारों श्रद्धालु यहाँ आते हैं।
कुछ रिपोर्टों के अनुसार, इस यात्रा में एक लाख से अधिक भक्त शामिल होते हैं।
यह यात्रा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि साहस और विश्वास की भी परीक्षा मानी जाती है।
कठिन रास्ता, लेकिन अटूट श्रद्धा
पहले समय में भक्तों को कई दिनों तक पैदल चलकर इस मंदिर तक पहुँचना पड़ता था। आज मकरान कोस्टल हाईवे बनने से यात्रा थोड़ी आसान हो गई है, लेकिन फिर भी यह मार्ग चुनौतीपूर्ण है।
रेगिस्तान, पहाड़ और गर्म मौसम—इन सबके बीच यह यात्रा भक्तों की आस्था को और मजबूत बनाती है।
चंद्रकूप: पापों की स्वीकारोक्ति का स्थान
हिंगलाज यात्रा के दौरान एक महत्वपूर्ण स्थान आता है जिसे चंद्रकूप कहा जाता है। यह एक कीचड़ वाला ज्वालामुखी जैसा गड्ढा है।
यहाँ श्रद्धालु अपने पापों की स्वीकारोक्ति करते हैं। मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति सच्चे मन से अपने पाप स्वीकार करता है, तो माता उसकी मनोकामनाएँ पूरी करती हैं।
हिंगोल नदी का महत्व
मंदिर में प्रवेश करने से पहले श्रद्धालु हिंगोल नदी में स्नान करते हैं।
मान्यता है कि इस पवित्र जल से पाप और रोग दूर हो जाते हैं।
रेगिस्तानी क्षेत्र में होने के बावजूद यह नदी कभी पूरी तरह नहीं सूखती—इसे माता की कृपा माना जाता है।
बिना मूर्ति का अनोखा मंदिर
हिंगलाज माता मंदिर की एक और विशेषता है कि यहाँ देवी की कोई बड़ी मूर्ति नहीं है।
गुफा के अंदर एक पवित्र पत्थर को ही माता का स्वरूप मानकर पूजा जाता है।
यही इसे अन्य मंदिरों से अलग और रहस्यमय बनाता है।
सीमाओं से परे आस्था
भारत और पाकिस्तान के बीच भले ही राजनीतिक सीमाएँ हों, लेकिन आस्था की कोई सीमा नहीं होती।
आज भी सिंधी और कई भारतीय हिंदू माता हिंगलाज को अपनी कुलदेवी मानते हैं और उनके दर्शन की इच्छा रखते हैं।
निष्कर्ष
हिंगलाज माता मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह उस आस्था का प्रतीक है जो सीमाओं, धर्म और परिस्थितियों से परे है।
रेगिस्तान के बीच एक छोटी सी गुफा में आज भी माँ शक्ति की दिव्यता महसूस की जाती है।
और शायद यही कारण है कि सदियों बाद भी लाखों भक्त श्रद्धा से कहते हैं—
जय माता हिंगलाज!









