21 अगस्त हल षष्ठी : क्यों रखा जाता है यह व्रत? जानिये पौराणिक कथा, पूजन विधि

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21 अगस्त हल षष्ठी : क्यों रखा जाता है यह व्रत ? जानिये पौराणिक कथा, पूजन विधि

हलषष्ठी व्रत महिलाएं परिवार की सुख समृद्धि और संतान की दीर्घायु, वास, सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। भारत के उत्तरी पूर्वी क्षेत्र में इसे ललई छठ, हरछठ के नाम से भी जाना जाता है। भगवान श्री कृष्ण के भाई बलराम जी के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में ही हलषष्ठी व्रत मनाने की परंपरा है। यह परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है क्योंकि बलराम का प्रधान शस्त्र हल और मूसल है। इसलिए उन्हें हलदर भी कहा जाता है। उनके ही नाम पर इस पुनीत पावन पर्व का नाम हलषष्ठी पड़ा है।

क्या है पौराणिक कथा

प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी. उसका प्रसवकाल अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसका मन गौ-रस (दूध-दही) बेचने में लगा हुआ था. उसने सोचा कि यदि प्रसव हो गया तो गौ-रस यूं ही पड़ा रह जाएगा।

यह सोचकर उसने दूध-दही के घड़े सिर पर रखे और बेचने के लिए चल दी किन्तु कुछ दूर पहुंचने पर उसे असहनीय प्रसव पीड़ा हुई. वह एक झरबेरी की ओट में चली गई और वहां एक बच्चे को जन्म दिया. वह बच्चे को वहीं छोड़कर पास के गांवों में दूध-दही बेचने चली गई. संयोग से उस दिन हल षष्ठी थी. गाय-भैंस के मिश्रित दूध को केवल भैंस का दूध बताकर उसने सीधे-सादे गांव वालों में बेच दिया.

उधर जिस झरबेरी के नीचे उसने बच्चे को छोड़ा था, उसके समीप ही खेत में एक किसान हल जोत रहा था. अचानक उसके बैल भड़क उठे और हल का फल शरीर में घुसने से वह बालक मर गया.

इस घटना से किसान बहुत दुखी हुआ, फिर भी उसने हिम्मत और धैर्य से काम लिया. उसने झरबेरी के कांटों से ही बच्चे के चिरे हुए पेट में टांके लगाए और उसे वहीं छोड़कर चला गया.

कुछ देर बाद ग्वालिन दूध बेचकर वहां आ पहुंची. बच्चे की ऐसी दशा देखकर उसे समझते देर नहीं लगी कि यह सब उसके पाप की सजा है.

वह सोचने लगी कि यदि मैंने झूठ बोलकर गाय का दूध न बेचा होता और गांव की स्त्रियों का धर्म भ्रष्ट न किया होता तो मेरे बच्चे की यह दशा न होती. अतः मुझे लौटकर सब बातें गांव वालों को बताकर प्रायश्चित करना चाहिए.

ऐसा निश्चय कर वह उस गांव में पहुंची, जहां उसने दूध-दही बेचा था. वह गली-गली घूमकर अपनी करतूत और उसके फलस्वरूप मिले दंड का बखान करने लगी. तब स्त्रियों ने स्वधर्म रक्षार्थ और उस पर रहम खाकर उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया.

बहुत-सी स्त्रियों द्वारा आशीर्वाद लेकर जब वह पुनः झरबेरी के नीचे पहुंची तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गई कि वहां उसका पुत्र जीवित अवस्था में पड़ा है. तभी उसने स्वार्थ के लिए झूठ बोलने को ब्रह्म हत्या के समान समझा और कभी झूठ न बोलने का प्रण कर लिया.

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 क्या हैं हलषष्ठी के नियम और पूजन विधि

हल से जुता हुआ कुछ खाना वर्जित

इस दिन माताओं को महुआ की दातुन और महुआ खाने का विधान है. इस व्रत में हल से जुता हुआ फल व अन्य खाना वर्जित माना गया है. साथ ही साथ गाय के दूध-दही का प्रयोग भी निश्चित है. इस व्रत को विवाहित पहली संतान की प्राप्ति व नवविवाहित स्त्रियां करती हैं. तत्पश्चात हलषष्ठी माता की कथा सुनने का भी विधान है. हलषष्ठी व्रत से संतान सुरक्षित रहती है. माताएं संतान की दीर्घायु व सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत प्राथमिकता से करती है.

पूजा विधि

पूजन विधि में सर्वप्रथम प्रात काल स्नान आदि से निवृत्त होकर गोबर से धरती को लीप जाता है. इसके बाद छोटे से तालाब की आकृति बनानी चाहिए. उस पर झावेरी क्लास का फूल, गूलर व उसकी एक-एक साफा बांधकर एक जगह रख दें. तत्पश्चात इनकी पूजा करें. भुना हुआ गेहूं, चना, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, जौ, आदी चढ़ाएं और इसी के साथ हल्दी के रंग में रंगा हुआ वस्त्र व सुहाग सामग्री चढ़ाएं.

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