पौष पूर्णिमा माघ मेला : प्रयाग में शुरू हुआ कल्पवास
इलाहाबाद, 2 जनवरी; तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती की रेती पर शुरू हुए पौष पूर्णिमा माघ मेले में त्याग, तपस्या और दान के कल्पवास का जमावडा शुरू होने से संगम तट गुलजार हो गया है। त्रिवेणी के संगम पर बसने वाली अस्थायी आध्यात्मिक नगरी में जप, तप, होम, यज्ञ, धूनी की बयार और संतों के प्रवचन आदि गतिविधियां एवं अन्य क्रिया कलाप एक मास तक तीर्थयात्रियों और कल्पवासियों को बांधे रखती हैं।
यहां विभिन्न संस्कृतियां, धर्म और विभिन्न विचारधाराओं का भी संगम होता है। विभिन्न प्रांतों से आये तीर्थयात्री आपस में विचार विमर्श कर सूचनाओं एवं ज्ञान का आदान प्रदान करते हैं। यह वसुधैव कुटुम्बकम का प्रतीक है. पापनाशिनी और मोक्षदायिनी विहंगम गंगा तट पर हाड कंपाने वाली सर्दी में पूरे एक महीने तक कल्पवासी तीन बार स्नान, जमीन पर शयन, जप, तप, होम, यज्ञ कर साधु-संतो के धूनी की मनमोहनक सुगंध में प्रवचन का श्रवण, एक समय भोजन या फलाहार कर कल्पवास करेंगे।
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इस दौरान कल्पवासी या तीर्थयात्री अन्न, काला तिल, ऊन, वस्त्र एवं बर्तन आदि का दान करते हैं। दिनेश नरेन्द्रवैदिक शोध एवं सांस्क़ृतिक प्रतिष्ठान कर्मकाण्ड प्रशिक्षण के आचार्य डा आत्मराम गौतम ने बताया कि महाभारत, रामचरितमानस और पद्मपुराण में प्रयाग के महात्म का वर्णन है। महाभारत में कहा गया है कि एक सौ साल तक बिना अन्न ग्रहण किए तपस्या करने का जो फल है, माघ मास में कल्पवास करने भर से प्राप्त हो जाता है।
फोटो में देखिए प्रयाग में माघ मेले की झलक…






पौष पूर्णिमा माघ मेला :
एक प्रसंग में मार्कंडेय धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं, राजन प्रयाग तीर्थ सब पापों को नाश करने वाला है। प्रयाग में जो भी व्यक्ति एक महीना, इंद्रियों को वश में करके स्नान-ध्यान, पूजा-पाठ, यज्ञ और संतो के सानिध्य में प्रवचन करने और श्रवण से मोक्ष प्राप्त होता है। आचार्य ने बताया कि कल्पवास दो प्रकार का होता है। पहला चंद्रमास और दूसरा सौर्य मास का कल्पवास। पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक चंद्रमास का कल्पवास रहता है और मकर संक्रांति से कुंभ संक्रांति तक सौर्य मास। कल्पवास को धैर्य, अभहसा और भक्ति के लिए जाना जाता है.पुराणों में प्रयागराज को सभी तीर्थो का राजा कहा गया है। अयोध्या, मथुरा, मायापुरी, काशी, कांची, उज्जैन, और द्वारका ये सात परम पवित्र नगरी मानी जाती हैं। ये सातों तीर्थ महाराजाधिराज प्रयाग की पटरानियां हैं। इन्हीं सब कारणों से भूमण्डल के समस्त तीर्थो में प्रयागराज सर्वश्रेष्ठ है। यहां माघ मकर में प्रतिवर्ष एक महीने का बड़ा मेला लगता है। मेले में आने वाले करोड़ो श्रद्धालु पतित पावनी गंगा में आस्था की डुबकी लगाते हैं। मान्यता है कि माघ महीने में प्रयाग में न सिर्फ लोग कल्पवास करते हैं, बल्कि 33 करोड़ देवी-देवता भी वहीं रहते हैं.
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