महामाया की जागृति का महापर्व देवशयनी एकादशी
आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी (23 जुलाई) एक ऐसा दिन है जब संसार श्री हरि विष्णु को भी महामाया विमोहित कर संसार का पालन कार्य अपने हाथों में ले लेती हैं। वैसे संसार के पालनकर्ता भगवान श्री हरि विष्णु को माना जाता है। पुराणों में वर्णन है कि भगवान श्री हरि विष्णु ही जगत के पालनकर्ता हैं लेकिन पालनकर्ता की ये शक्ति भी महामाया की इच्छा से ही संचालित होती है और और आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी से लेकर देवोत्थान एकादशी तक की अवधि में आद्या शक्ति महामाया खुद पालन का कार्य संभालती हैं। देवशयनी एकादशी के दिन भगवान श्री हरि विष्णु क्षीरसागर में शयन करने चले जाते हैं औऱ इसके बाद के चार महीनों में सृष्टि का सारा कार्य योगमाया देवी के हाथों में होता है । इसी दिन से वर्षा ऋतु का आरंभ माना जाता है,उस ऋतु का जिसमें प्रकृति स्वरुपा महामाया देवी पृथ्वी, जल और आकाश में जीवन के विभिन्न रुपों का सृजन करती हैं। वर्षा ऋतु में ही जल से लेकर आकाश तक में जीवों की उत्तप्ति होती है । जब पुरुष की शक्ति निष्क्रिय होती है तभी प्रकृति नए जीवों का सृजन करती हैं। यही कारण है कि वर्षा ऋतु में अनेक नई प्रकार के वनस्पतियों का सृजन होता है , नए-नए जीवों की उत्पत्ति होती है और पुराने वनस्पतियों और जीवों को पुनर्जीवन मिलता है। सारा संसार प्रकृति यानि माया के हाथों संचालित होता है। वैज्ञानिक रुप से देखें तो वर्षा ऋतु में सूर्य का प्रकाश बादलों की वजह से पृथ्वी पर कम पहुंचता है जिसके कारण नए जीवों और वनस्पतियों की उत्पत्ति होती है। सूर्य यानि आदित्य अर्थात विष्णु का प्रभाव कम हो जाता है और प्रकृति यानि पृथ्वी यानि लक्ष्मी या फिर महामाया सृष्टि को अपने नियंत्रण में लेकर नए जीवों की उत्पत्ति करती हैं ।फिर जब देवोत्थान एकादशी यानि कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी को भगवान श्री हरि विष्णु वापस जागते हैं तो फिर वो इन नए वनस्पतियों और जीवों का पालन करते हैं।
देवशयनी एकादशी इस प्रकार भगवान श्री हरि विष्णु के शयन का प्रारंभ है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि सिर्फ सनातन धर्म में ही नहीं बल्कि अन्य सभी धर्मों में ईश्वर के आराम करने की बात कही गई है। बाईबिल और कुरान की बात करें तो वहां भी ईश्वर ने छह दिनों में संसार का निर्माण किया और सातवे दिन आराम किया । इसीलिए यहूदी और ईसाई रविवार को आराम का दिन मानते हैं। जैन धर्म और बौद्ध धर्मों में भी चतुर्मास के प्रारंभ का दिन देवोत्थान एकादशी को ही माना जाता है।
लेकिन आखिरकार भगवान श्री हरि विष्णु शयन क्यों करते हैं । अगर हम मार्कण्डेय पुराण को पढ़ें तो इसके मुताबिक जब संसार सुचारु रुप से अपने लय में चलने लगता है तो भगवान श्री हरि विष्णु को योगमाया देवी विमोहित कर देती हैं और उन्हे योगनिद्रा के वश में कर खुद प्रकृति का संचालन करने लगती हैं। यही वजह है कि इस अवधि में भगवान विष्णु की अनुपस्थिति में सारे शुभ कार्य स्थगित कर दिये जाते हैं और वही कार्य किये जाते हैं जिनका जीवन के सृजन से संबंध हों।
वैसे इन दिन को पुराणों में काफी महत्व दिया गया है। भविष्यत् पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराणों के मुताबिक इस दिन व्रत रखने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। कथा है कि सतयुग में मंधाता नामक चक्रवर्ती सम्राट के राज्य में जब अकाल पड़ा तो ऋषि अंगिरा ने उन्हें अकाल से मुक्ति के लिए यह व्रत करने को कहा था। एक कथा ये भी है कि भगवान श्री हरि विष्णु ने जब वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी और दो पगों में ही सारी सृष्टि को नाप दिया था तब राजा बलि को उन्होंने वरदान मांगने को कहा । राजा बलि ने उनसे नित्य उनके साथ रहने का वरदान मांग लिया था। तब महामाया लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षाबंधन के धागे से अपना भाई बना लिया और उपहार स्वरुप भगवान विष्णु को वापस मांग लिया था। लेकिन इसके बाद भगवान विष्णु , ब्रम्हा और शिव जी ने राजा बलि को यह वरदान दिया था कि वो तीनों एक एक कर चार चार मास के अंतराल पर उसके लोक सुतल लोक में वास करेंगे । इस कथा के मुताबिक देवशयनी एकादशी से लेकर देवोत्थान एकादशी तक भगवान विष्णु राजा बलि के सुतल लोक में वास करते हैं , देवोत्थान एकादशी से लेकर महाशिवरात्री तक भगवान शिव राजा बलि के लोक में वास करते हैं और महाशिवरात्री से लेकर देवशयनी एकादशी तक ब्रम्हा जी राजा बलि के साथ रहते हैं।
अगर ज्योतिषिय दृष्टिकोण से देखें तो सायण परंपरा से जब सूर्य मिथुन राशि में देवशयनी एकादशी के दिन जाते हैं। मिथुन राशि मूलत रति और काम की राशि है। माया से विमोहित संसार के चक्र में जाने की राशि है। सूर्य का प्रभाव यहां कम हो जाता है और जैसे ही देवोत्थान एकादशी के दिन जब सूर्य तुला राशि में प्रवेश करते हैं तो विष्णु पुन: जाग्रत हो जाते हैं । तुला राशि शनि की राशि है और शनि को न्याय का देवता भी माना जाता है । तो देवशयनी एकादशी से लेकर देवोत्थान एकादशी के दौरान माया के प्रभाव में हम जो कुछ भी करते हैं उसका न्याय सूर्य यानि आदित्य यानि विष्णु देवोत्थान एकादशी के दिन से करना शुरु करते हैं।इसलिए यह दिन स्वविवेक के जागरण का भी दिन है । अगले चार महीनें खुद को संयम में रखने का भी दिन है । यही वजह है कि चतुर्मास के दौरान एक स्थान पर रहने का निर्देश दिया गया है। किसी भी तरह के पापकर्म से खुद को बचाने का निर्देश दिया गया है । इसी दौरान कई प्रकार के वनस्पतियों को भी खाने की मनाही है क्योंकि इन वनस्पतियों के अंदर जो कीट पाए जाते हैं कहीं उन्हें खाने से कोई पाप न हो जाए। कहीं भी आने जाने की मनाही इस लिए भी है क्योंकि पैरो के नीचे कोई कीट पतंग ना आ जाए और हत्या का दोष न लग जाए। ऐसे ही निर्देश सनातन धर्म के अलावा जैन औऱ बौद्ध धर्म मे भी दिये गए हैं।
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लेखक – अजीत मिश्रा ( ajitkumarmishra78@gmail.com)
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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