भक्तिकालीन साहित्य की प्रासंगिकता‘ पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में विचार गोष्ठी

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भक्तिकालीन साहित्य की प्रासंगिकता‘ पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में विचार गोष्ठी

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के तत्त्वावधान में आज ‘विश्वविद्यालय प्रसार व्याख्यान‘ श्रृंखला के अंतर्गत ‘‘भक्तिकालीन साहित्य की प्रासंगिकता‘‘ विषय पर कला संकाय सभागार में व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के निदेशक, प्रो. नंदकिशोर पाण्डेय रहे तथा अध्यक्षता विश्वविद्यालय के सह-कुलपति प्रो अख़तर हसीब ने की।

भक्तिकालीन साहित्य का विविध कोणों से विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए मुख्य वक्ता प्रो. नंदकिशोर पाण्डेय ने वर्तमान संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता को उजागर किया। उन्होंने उक्त साहित्य में सन्निहित उन समस्त तत्त्वों, कारकों तथा शक्तियों की विस्तारपूर्वक चर्चा की जो उसे वर्तमान समय में भी प्रासंगिक बनाए हुए हैं। प्रो. पाण्डेय ने कहा कि संतों ने संस्कृत जैसी परिनिष्ठित भाषा की अपेक्षा सर्वमान्य लोकभाषा को साहित्य-सर्जना के लिए चुना। विद्यापति, तुलसी तथा आलवार भक्तों के उदाहरण के माध्यम से उन्होंने भक्ति-साहित्य में परंपरागत भाषा की तुलना में जनभाषाओं के महत्त्व को प्रतिपादित किया। उन्होंने कहा कि भक्तिकालीन साहित्य न केवल सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक धरातल पर अस्पृश्यता का खण्डन करता है अपितु आलवार भक्तिन आण्डाल के माध्यम से साहित्य में स्त्री रचनाकारों की भागीदारी को भी महत्ता प्रदान करता है।

भक्तिकालीन साहित्य के वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालते हुए प्रो. पाण्डेय ने संतों की रचनाओं में निर्वैरता की प्रवृत्ति को प्रमुखता से रेखांकित किया। कबीर, दादू आदि की रचनाओं को उद्धृत करते हुए उन्होंने सिद्ध किया कि किस प्रकार संतों ने सगुण-निर्गुण, जाति-धर्म के विभिन्न भेदों को विस्मृत कर समाज में सद्भावना तथा समरसता का प्रसार किया।

सामाजिक-धार्मिक समरसता, सांस्कृतिक एकता तथा भाषागत विविधता को भक्तिकालीन साहित्य की मूल चेतना के रूप में रेखांकित करते हुए प्रो. पाण्डेय ने कहा कि यद्यपि संतों ने बाह्याडंबरों का भी विरोध किया है, तथापि जीवन में संयम, अपरिग्रह आदि आंतरिक तत्त्वों की स्थापना उनके साहित्य का प्रधान लक्ष्य है। इस प्रकार, भक्तिकालीन साहित्य का सारगर्भित एवं मूल्यपरक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने वर्तमान समाज की विषम परिस्थितियों तथा सामाजिक, राजनीतिक संदर्भों के आलोक में उक्त साहित्य की प्रासंगिकता और उपयोगिता से सभी को अवगत कराया।

विश्वविद्यालय के सह-कुलपति प्रो. अख़तर हसीब ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. पाण्डेय के वक्तव्य की सराहना करते हुए व्याख्यान की महत्ता पर प्रकाश डाला। साथ ही, भक्तिकालीन साहित्य में निहित मानवता, शांति, सौहार्द्र आदि मूल्यों की चर्चा करते हुए वर्तमान समय एवं समाज में उसकी प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे।

कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. मोहम्मद हाशिम ने व्याख्यान को अत्यंत महत्त्वपूर्ण और ज्ञानवर्द्धक बताया।

अतिथियों का स्वागत करते हुए ‘‘विश्वविद्यालय प्रसार व्याख्यान‘‘ श्रृंखला के सह-समन्वयक प्रो. मोहिबुल हक ने आशा व्यक्त की कि प्रो. नंदकिशोर पाण्डेय का व्याख्यान श्रृंखला के आगामी कार्यक्रमों को एक नई दिशा प्रदान करते हुए मानदण्ड स्थापित करेगा।

कार्यक्रम का सफल संयोजन हिन्दी विभाग के अध्यक्ष, प्रो. अब्दुल अलीम ने किया तथा कुशल संचालन प्रो. शंभुनाथ तिवारी ने किया। विभागाध्यक्ष प्रो. अब्दुल अलीम द्वारा मुख्य अतिथि, प्रो. नंदकिशोर पाण्डेय और विश्वविद्यालय के सह-कुलपति, प्रो. अख़तर हसीब को पुष्प-गुच्छ एवं स्मृति-चिह्न देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर प्रो. जिआ-उर-रहमान द्वारा तैयार किए गए ‘हिन्दी-उर्दू कोश‘ का लोकार्पण भी संपन्न हुआ। व्याख्यान के दौरान बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी व छात्र उपस्थित रहे।

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