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“बसंत पंचमी” पर जानें क्या है “परम विद्या”

“बसंत पंचमी” पर जानें क्या है “परम विद्या”

“बसंत पंचमी” पर जानें क्या है “परम विद्या”
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“बसंत पंचमी” पर जानें क्या है “परम विद्या”

“बसंत पंचमी” पर जानें क्या है “परम विद्या”

लेखिका – साध्वी जया भारती

बसंत पंचमी विद्या की देवी माँ सरस्वती के पूजन का दिवस है। इसी दिन माँ सरस्वती सृष्टि में पसरे जड़ मौन को सरस ध्वनि से स्पंदित और संचारित करने के लिए वीणा हाथ में लिए अवतरित हुई थी। आज के दिन उनकी पूजा की जाती है, उनकी आराधना की जाती है और प्रार्थना की जाती है हमें विद्या प्राप्त हो। विद्या शब्द अपने आप में गूढ है और स्वयं मे उस रहस्य को संजोय है जिसे जानने के लिए मानव जाती आदि काल से प्रयास करती आ रही है। शास्त्रों मे विद्या को परिभाषित करते हुए कहा गया है :

सा विद्या या विमुक्तए

मात्र वही विद्या जो आपको मुक्ति प्रदान करे।

सामान्यतः यह मान्यता है की दुखों, व्याधियों, अभाव, और कष्टों से मुक्त हो जाना ही मुक्ति है। यदि ‘मुक्ति’ शब्द का वास्तविक अर्थ देखें तो वह है ‘स्वतंत्र’ अर्थात जिस पर किसी और का शासन न हो, जो स्वयं के तंत्र से निर्देशित होता हो। मनुष्य जीवन में ‘स्व’ का अर्थ है आत्मा। जब मानव की आत्मिक चेतना इतनी विकसित हो जाए कि वह मन के वशीभूत न हो तब उसे आध्यात्मिक सिद्धान्त के अनुसार मुक्त या स्वतंत्र कहा गया है। आत्मिक चेतना के जागरण के आभाव में मानव मन, शरीर और संस्कारों की सीमाओं में बंधा रहता है। शरीर, मन और बुद्धि की क्षमता सीमित है। मन और बुद्धि उतना ही विचार पाती है जितनी उसने अपने वातावरण के संपर्क से, अध्ययन से अथवा देख-सुन कर जानकारी प्राप्त की होती है। या फिर किसी वाद या अनुभव और यथार्थ से रहित कल्पना में विचरतीं है। जब मनुष्य अपने अस्तित्व के मात्र इन पक्षो को ही जनता है और अपने वास्तविक स्वरूप ‘आत्मा’ का बोध नहीं कर पता तो वह शरीर, मन और बुद्धि के प्रशासन द्वारा ही संचालित होता है और इसे बंधन कहा जाता है। कठोपनिषद में कहा गया है – ‘आत्मानां रथीनं विद्धि शरीरम रथमेव च’ अर्थात आपके जीवन मे आत्मा रथ को चलाने वाली रथी है और बुद्धि शरीर एतयादी यह रथ हैं। लेकिन यदि आपके जीवन रूपी रथ को आपका वास्तविक स्वरूप आत्मा नहीं बल्कि मन हांक रहा है तो आप मुक्त नहीं हैं, आपके पास शिक्षा हो सकती है परंतु मन को वश मे कर मुक्त करने वाली विद्या नहीं है। और इसी विद्या को प्राप्त करने के पश्चात जीवन मे बसंत आता है। जीवन में वास्तविक सुख पुष्पित होता है। यह विद्या ही हमारी चेतना को आत्मा से जोड़ती है। इस जुड़ने को ही योग कहा गया है।

इसी विषय पर जब भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को योग के विषय में बता रहे हैं तब मन के चंचल स्वभाव से बंधे हुए अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा था :

चंचलम ही मनः कृष्ण प्रमाथी बल्वद्रदृम, तस्याहं निग्रहं मन्ये वायुरिव सुदुष्करम

हे कृष्ण यह मन स्वभाव वश चंचल है, बुद्धि, शरीर और इंद्रियों को मथ देने वाला है। बलवान और दृढ़ है, अतः मन को वश में करना मैं वायु को वश मे करने के समान दुष्कर मानता हूँ।  मैं इसके बंधन से कैसे मुक्त हो पाऊँगा। तब भगवान कृष्ण अर्जुन को समाधान देते हुए कहते हैं…

‘असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृहयेते।

अर्जुन को महा बलशाली कहते हुए कृष्ण कहते हैं की इसमे कोई संशय नहीं है कि मन को वश में करना बहुत कि दुर्गम कार्य है परंतु हे कौन्तेय (ज्ञान के) अभ्यास से मन को वश में किया जा सकता है। अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर वो ऐसा कौन सा ज्ञान है कौनसी विद्या है जिसके अभ्यास से मन को वश में कर उसके द्वारा बुने गए बंधनो से मुक्त हुआ जा सकता है यह किस ज्ञान, किस विद्या कि बात भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं?

इस परम विद्या का सारगर्भित विवरण श्रीमद भगवत गीता के नौवें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण मानव जाती के लिए दिया है।

 इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌ ॥

अर्जुन मैं विज्ञान से युक्त इस ज्ञान को भली भांति तेरे लिए फिर से कहता हूँ । जिस ज्ञान को जानने के बाद तू  समस्त बंधनो से मुक्त हो जाएगा।

आगे भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्‌ । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्‌ ॥

यह ज्ञान सभी विद्याओं का राजा है, गोपनीय विषयों का राजा, अतिशय पवित्र, प्रत्यक्ष अनुभव योग्य, धर्म संगत, बिना कष्ट के सिद्ध होने वाला और सनातन है।

वह युक्ति जिस से इस सृष्टि के मूल तत्व के दर्शन हों उसका साक्षात्कार हो उसे ही राज विद्या कहा गया। वह आदि ब्रह्म तत्व जिस से सम्पूर्ण सृष्टि रची गयी है वही तत्व हमारा मूल तत्व है। जिस विद्या से उस परम तत्व के दर्शन हों उसका ज्ञान हो उसे राज विद्या या परम-विद्या या ब्रह्मज्ञान कहा गया।  श्री चैतन्य चरितामृत में राय रामानन्द तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच संवाद में पाया जाता है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, “समस्त विद्याओं मे सबसे श्रेष्ठ विद्या क्या है?” तब राय उत्तर देते हैं कि जिस विद्या से आपकी मति ईश्वर से जुड़े उस से मिल पाये वही श्रेष्ठ विद्या है।

मेरे गुरु देव श्री आशुतोष महाराज कहते हैं, “मनुष्य ईश्वर का अंश है, हमारी आत्मा परमात्मा का अंश है जब हम अपने आत्म तत्व को अनुभव कर लेते हैं तो वही ईश्वर का अनुभव होता है। इसलिए जिन ज्ञानी श्रेष्ठ जनों ने इस अनुभव को प्राप्त किया उन्होने कहा ‘अहम ब्रह्मास्मि’ अर्थात ‘मै ही ब्रह्म हूँ’। मनुष्य ईश्वर का अंश है – ईश्वर अंश जीव अविनाशी (राम चरित मानस) और समस्त शास्त्रों, ग्रंथो और ज्ञानी जानो के अनुभव का सार यह है की ईश्वर की अनुभूति करने वाली युक्ति ही परम विद्या है। ब्रह्म ज्ञान ही परम ज्ञान है।”

ईश्वर के वास्तविक स्वरूप, अपने वास्तविक तत्व को बताते हुए श्री कृष्ण ने कहा, ज्योतिषाम अपि तत् ज्योतिः तामसाः परम् उच्यते I ज्ञानम् ज्ञेयं ज्ञान गम्यम् हृदि सर्वस्य धिष्टितम II

मेरा वास्तविक स्वरूप, आत्मा का, ईश्वर का वास्तविक स्वरूप ज्योति है, मैं ज्योतियों की भी ज्योति हूँ, अंधकार से अति परे हूँ, ज्ञान के द्वारा जाना जाता हूँ और सभी के हृदय मे निवास करता हूँ। ईश्वर के ज्योति रूप के बारे मे सुन कर अर्जुन ने उसको देखने कि इच्छा व्यक्त कि – हे पुरुषोत्तम कृष्ण मै आपके इस रूप को देखने कि इच्छा राखता हूँ…

“दृषटुमिच्छामी ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम”

तब भगवान कृष्ण अर्जुन के समक्ष रहस्य का उदघाटन करते हैं और कहते हैं कि इन स्थूल आँखों से इस तत्व को नहीं देखा जा सकता:

“न तू मां शक्यसे द्रषटुमनेनैव स्वचक्षुषा, दिव्यं ददामी ते चक्षुः पश्य मे योगमैशवरम”।    

हे अर्जुन तू अपने और मेरे वास्तविक स्वरूप को अपनी इन दो स्थूल आँखों से नहीं देख सकता, मै तेरे तीसरे नेत्र का उन्मीलन करता हूँ, तेरे दिव्य चक्षु को खोलता हूँ तभी तो मरे ऐश्वर्यवान रूप को अपने भीतर देख पाएगा। तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के मस्तक पर हाथ रख कर उसके तीसरे नेत्र को खोल दिया और अर्जुन से पूछा कि वह क्या देख पा रहा है, तब अर्जुन ने उत्तर दिया, “दिवि सूर्य सहस्त्राणी …” मै सहसत्रों सूर्यों से भी अधिक प्रकाश को अपने अंदर देख पा रहा हूँ।

गीता के अंतर्गत भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच का यह संवाद और अर्जुन को ज्ञान कि प्राप्ति अखंड मानव जाती को यह संदेश देती है कि वास्तविक विद्या वही है जिस से हमारी चेतना उस परम तत्व के दर्शन कर के विकसित हो। हम मात्र शरीर, मन और बुद्धि कि सीमाओं से ऊपर उठ कर अपनी वास्तविक शक्तियों को जाने । इस ज्ञान के बाद ही अर्जुन ने गाँडीव संभाला और युद्ध के लिए तत्पर हो गया।

इसे विद्या को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को क्या क्या करना चाहिए यह भी भगवान कृष्ण ने बताया है,  तद्विधी प्रणिपातेन परीप्रशनेन सेवाया, उपदेक्षयन्ती ते ज्ञानं ज्ञानिनस्त तत्वदर्शिनः।

अर्जुन इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए किसी संत/साधू के पास जाओ, गुरु जनो के पास जाओ और उनकी सेवा मे प्रश्न रखो कि वह विधि क्या है जिस से ईश्वरीय तत्व को, अपने आत्मतत्व को इस सृष्टि के मूल तत्व को जाना जाता है। एक ऐसा गुरु जिसने उस तत्व को जाना है जिसके पास वह विधि व विद्या है वह तुम्हें  ज्ञान का उपदेश करेंगे (ज्ञान दीक्षा) जिस से तुम्हें तत्क्षण उस तत्व के दर्शन होंगे।

आज बसंत पंचमी के दिन हम भी माँ सरस्वती से प्रार्थना करें कि हमारा मार्ग ऐसे गुरु की ओर प्रशस्त करें जो तत्वदर्शी हो और जो हमें भी उस परम विद्या को दे सके जिस से हमारे भी तीसरे नेत्र का उन्मीलन हो और हम भी भौतिक बंधनो से मुक्त हों।

मैं माँ सरस्वती के चरणों मे धन्यवाद अर्पित करती हूँ की मुझे श्री आशुतोष महाराज जी जैसे श्रोत्रिय ब्रहमनिष्ठ तत्वदर्शी गुरु का सन्निध्य् मिला और मैं अपने अंदर उस ईश्वर के तत्व के दर्शन कर पायी। आज उन्ही के द्वारा प्रद्त ब्रह्म ज्ञान से मेरी चेतना अंधकार से ज्योति की ओर मुड़ गयी, मृत्यु से अमृतत्व की ओर बढ़ गयी, असत्य से सत्य की ओर उन्मुख हो गयी।

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें

यह भी पढ़ें-बसंत पंचमी 2021: बसंत पंचमी में यह उपाय आपको करेंगे प्रसन्न

लेखिका – साध्वी जया भारती, श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या हैं और दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की प्रचारक हैं।

Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

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February 10, 2019 8 min read
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