परमार्थ निकेतन में आयुर्वेद, गायों की रक्षा एवं वैश्विक जलवायु परिवर्तन पर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन

- कार्यशाला का आयोजन स्वामी भास्करानन्द आयुर्वेद शोध संस्थान थानो, देहरादून द्वारा किया गया
- स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज के पावन सान्निध्य एवं आशीर्वाद से कार्यशाला का शुभारम्भ
- कार्यशाला में पर्यावरण विशेषज्ञ, आयुर्वेद विशेषज्ञ, प्रसिद्ध वैध, गौ विशेषज्ञ, जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ ने किया सहभाग
ऋषिकेश, 26 अक्टूबर। परमार्थ निकेतन में आयुर्वेद, गायों की रक्षा एवं वैश्विक जलवायु परिवर्तन पर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज के पावन सान्निध्य एवं आशीर्वाद से स्वामी भास्करानन्द आयुर्वेद शोध संस्थान थानो, देहरादून द्वारा आयुर्वेद, गायों की रक्षा एवं वैश्विक जलवायु परिवर्तन कार्यशाला का आयोजन किया गया।

कार्यशाला का उद्घाटन स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज, सचिव उत्तराखण्ड सरकार श्री आर मिनाक्षी सुन्दरम्, मुख्य वन संरक्षक जयराज जी, एम्स के निदेशक डाॅ रविकान्त, निदेशक आयुर्वेद युनियन सविर्सेस देहरादून प्रो अरूण कुमार त्रिपाठी, चेयरमेन रूलर बिजनेस हब इन्डिया, डाॅ कमल टावरी, श्रीमती पूजा एवं अन्य विशिष्ट अतिथियांे ने दीप प्रज्जवलित कर किया।
कार्यशाला में चर्चा हुयी कि ग्रीन हाऊस प्रभाव, वैश्विक तपन, जलवायु परिवर्तन, गौ माता की रक्षा, गाय के उत्पादों का अधिक से अधिक प्रयोग कर गायों को संरक्षण प्रदान करना। हिमालयन जड़ी–बुटी का अधिक से अधिक प्रयोग, आयुर्वेद को विश्व स्तर पर पहचान दिलाना। साथ ही वनों का संरक्षण, वृक्षारोपण और जल संरक्षण जैसे अनेक विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।

परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि ’’जैव विविधता का संरक्षण और संतुलित उपयोग करना ही प्राकृतिक नियम है। प्रदूषित होता पर्यावरण और वैश्विक स्तर पर बढ़ता ग्लोबल वार्मिग का खतरा पूरी सृष्टि के लिये खतरा है। हमारे द्वारा प्रयोग किया जा रहा प्लास्टिक, पर्यावरण को सबसे अधिक प्रदूषित कर रहा है अतः प्लास्टिक का कम से कम प्रयोग करे तो बेहतर होगा।’’
स्वामी जी महाराज ने कहा कि आयुर्वेद और योगमय जीवन पद्धति ही उत्कृट जीवन पद्धित है। उन्होने कहा कि हमारे पास हिमालय जैसा आयुर्वेद का खजाना है इसका उपयोग कर हम पलायन को रोक सकते है और हरित पर्यटन को बढ़ा सकते है।

आयोजन मंडल ने कहा कि परमार्थ निकेतन गंगा के तट पर आयुर्वेद, गायों की रक्षा एवं वैश्विक जलवायु परिवर्तन कार्यशाला का आयोजन हमारे लिये सौभाग्य का विषय है। उन्होने कहा कि गायों को संरक्षण प्रदान कर हम अपनी संस्कृति की रक्षा कर सकते है। भारतीय संस्कृति में गायों की पूजा की जाती है, गायों का संरक्षण मतलब संस्कृति का संरक्षण अतः गायों के संरक्षण के माध्यम से हम पर्यावरण का संरक्षण कर सकते है।

इस कार्यशाला में सैकड़ों की संख्या में प्रतिभागियों ने प्रतिभाग किया।
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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