एक ऐसा शक्तिपीठ जहां नहीं है माता की कोई प्रतिमा, यहीं हुआ था भगवान श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार

राजस्थान–गुजरात सीमा पर स्थित अंबा माता मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। राजस्थान के आबूरोड से करीब 25 किलोमीटर दूर गुजरात बॉर्डर पर अहमदाबाद मार्ग पर बनासकांठा जिले में स्थित अंबा माता मंदिर की विशेष मान्यता है। वैसे तो यहां सालभर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है लेकिन नवरात्र के दिनों में माता के दरबार में देशभर से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह मंदिर करीब 1200 साल पुराना है। आरासुर पर्वत पर विराजमान होने की वजह से इन्हें आरासुरी अंबाजी के नाम से भी जाना जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार अंबा माता के दरबार में जा चुके हैं।

मंदिर में नहीं है प्रतिमा
अंबा माता मंदिर की खास बात यह है कि यहां माता की कोई प्रतिमा नहीं है। यहां श्रीयंत्र के दर्शन और पूजा होती है। साथ ही मां सती के शरीर का जो हिस्सा यहां गिरा था उसके स्वरूप को भी पूजा जाता है। मंदिर में बीजयंत्र के सामने अखंड ज्योति प्रज्जवलित होती रहती है। हर महीने पूर्णिमा और अष्टमी को मां की विशेष पूजा–अर्चना की जाती है। मान्यता है कि अष्टमी के दिन मां 24 घंटे श्रीयंत्र में विराजमान रहती हैं। नवरात्र के दौरान खासकर अष्टमी को यहां श्रद्धा का सैलाब उमड़ता है।
गब्बर पहाड़ी की भी खास मान्यता
अंबा माता मंदिर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित पहाड़ी पर गब्बर नाम का स्थान है। माना जाता है कि इसी जगह एक ग्वाले को माता ने साक्षात दर्शन दिए थे। गब्बर की चढ़ाई के दौरान रास्ते में एक गुफा आती है जिसे माता का द्वार कहा जाता है। यहां पहाड़ के अंदर मंदिर में माता का झूला भी है। गब्बर के शीर्ष पर माता की क्रीडास्थली है जहां पत्थर पर अंगुलियों के निशान दिखाई देते हैं। पारस पीपला स्थान और भगवान श्रीकृष्ण का ज्वार भी यहीं स्थित है।
अंबाजी में हुआ था भगवान श्रीकृष्ण का मुंडन
अंबाजी मंदिर को लेकर यह मान्यता भी है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार हुआ था।माता यशोदा ने जिस स्थान पर श्रीकृष्ण का मुंडन करवाया था उसे श्रीकृष्ण के ज्वार के नाम से जाना जाता है।अंबा माता को कुलदेवी के रूप में पूजने वाले समाजों के बच्चों का मुंडन यहीं होता है।
राम–लक्ष्मण, श्रीकृष्ण और पांडवों ने की थी मां की आराधना
मान्यता है कि भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी ने भी अंबा माता की आराधना की थी। अंबाजी ने ही अजय नामक बाण भगवान श्रीराम को दिया था जिससे उन्होंने रावण का वध किया था। द्वापर में श्रीकृष्ण ने यहां माता की उपासना की थी वहीं पाण्डवों ने भी अंबा माता की पूजा–अर्चना की थी। मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने अपने वस्त्र यहीं छिपाकर रखे थे। अज्ञातवास के बाद पाण्डवों ने इस मंदिर का पुनर्निमाण करवाया।
महाराणा प्रताप पर हुई थी माता की कृपा
बताया जाता है कि नदी पार करते वक्त महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का पैर एक पेड़ में फंस गया जिससे उनकी जान जोखिम में आ गई। ऐसे में महाराणा प्रताप ने माता का ध्यान कर कृपा का गुहार लगाई जिससे उनके प्राणों की रक्षा हुई।इसके बाद महाराणा प्रताप ने माता के दर्शन किए और अपनी तलवार मां के चरणों में भेंट की।
सप्ताह के हर दिन होता है अलग श्रृंगार
अरासुरी अंबामाता के 7 वाहन हैं। इसलिए सप्ताह के हर दिन इनका अलग–अलग श्रृंगार होता है।माता का कोई स्वरूप नहीं है सिर्फ श्रीयंत्र है जो विशेष श्रृंगार से माता का स्वरूप प्रतीत होता है।

रिपोर्ट– डॉ. देवेन्द्र शर्मा
ईमेल: sharmadev09@gmail.com
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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